मातृ-भू शत-शत बार प्रणाम
मातृ-भू, शत-शत बार प्रणाम
ऐ अमरों की जननी, तुमको शत-शत बार प्रणाम,
मातृ-भू शत-शत बार प्रणाम।
तेरे उर में शायित गांधी, 'बुद्ध औ' राम,
मातृ-भू शत-शत बार प्रणाम।
हिमगिरि-सा उन्नत तव मस्तक,
तेरे चरण चूमता सागर,
श्वासों में हैं वेद-ऋचाएँ
वाणी में है गीता का स्वर।
ऐ संसृति की आदि तपस्विनि, तेजस्विनि अभिराम।
मातृ-भू शत-शत बार प्रणाम।
हरे-भरे हैं खेत सुहाने,
फल-फूलों से युत वन-उपवन,
तेरे अंदर भरा हुआ है
खनिजों का कितना व्यापक धन।
मुक्त-हस्त तू बाँट रही है सुख-संपत्ति, धन-धाम।
मातृ-भू शत-शत बार प्रणाम।
प्रेम-दया का इष्ट लिए तू,
सत्य-अहिंसा तेरा संयम,
नयी चेतना, नयी स्फूर्ति-युत
तुझमें चिर विकास का है क्रम।
चिर नवीन तू, ज़रा-मरण से -
मुक्त, सबल उद्दाम, मातृ-भू शत-शत बार प्रणाम।
एक हाथ में न्याय-पताका,
ज्ञान-द्वीप दूसरे हाथ में,
जग का रूप बदल दे हे माँ,
कोटि-कोटि हम आज साथ में।
गूँज उठे जय-हिंद नाद से -
सकल नगर औ' ग्राम, मातृ-भू शत-शत बार प्रणाम।
झाँसी की रानी

रचनाकार: सुभद्रा कुमारी चौहान
सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,
बूढ़े भारत में आई फिर से नयी जवानी थी,
गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी,
दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।
चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी।।सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,
बूढ़े भारत में आई फिर से नयी जवानी थी,
गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी,
दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।
चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
कानपूर के नाना की, मुँहबोली बहन छबीली थी,
लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी,
नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी,
बरछी ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी।
वीर शिवाजी की गाथायें उसकी याद ज़बानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार,
देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार,
नकली युद्ध-व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार,
सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवार।
महाराष्टर-कुल-देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में,
ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में,
राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छाई झाँसी में,
चित्रा ने अर्जुन को पाया, शिव से मिली भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, ....... आगे
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Arvind Gaurav
कुछ विश्व कविताएँ
जॉर्ज डे लिमा
पुर्तगाली कवि
(1893-1953)
विशाल हाथ
आँधी-तूफ़ान की रातपाली अंदर,
रहस्य कैरावल; हल्कापाल-जहाज़ उधर जाता है.
समय घूमता है, और पानियों को निराश करता है,
हवा रोती है मनहूस ज़ोर ज़ोर.
रहस्य कैरावल उधर जाता है.
इस जहाज़ उपर
कौन हाथ है इतना बड़ा
समुद्र तक से भी?
पाइलट का हाथ?
हाथ किसका?
कैरावल डूबता है,
समुद्र खड़ा है सियाह,
समय घूमता है.
इस जहाज़ उपर
बड़ा हाथ
बहते ख़ून सना है.
कैरावल उधर जाता है.
समुद्र पछाड़े खाता है,
भूमि ग़ायब होती है,
तारे गिरते हैं.
कैरावल जारी रहता है और
उपर इस जहाज़ के
सनातन हाथ
है वहाँ.
* * * * * * * *
काव्य का वितरण
मैंने लिया वनस्पतियों से जंगली शहद,
मैंने लिया नमक पानियों से, मैंने रोशनी ली आकाश से.
सुनो, मेरे भाइयों मैंने काव्य लिया सबकुछ से
इसे देवता को अर्पित करने वास्ते.
मैंने नहीं खोदा था सोना धरती से
या चूसा जोंक की तरह ख़ून अपने भाइयों का.
सरायवासियो मुझे अकेला होने दो.
फेरीवालो और साहूकारो
मैं फासलों को गढ़ सकता हूँ
तुम्हें अपने से परे रखने के लिए.
जीवन एक विफलता है,
मैं विश्वास करता हूँ ईश्वर के जादू में.
बसेरू मुर्गे बांग नहीं दे रहे,
दिन उतरा नहीं है.
मैंने देखा जहाज़ों को जाते और आते.
मैंने देखा दुर्दशा को जाते और आते.
मैंने देखा चर्बीले आदमी को आग में.
मैंने देखा सर्पीलाकारों को अंधेरे में.
कप्तान, कहाँ है कांगो?
कहाँ है संत ब्रैंडॉन का टापू?
कप्तान, कितनी काली है रात!
ऊँची नस्लवाले कुत्ते भौंकते हैं अंधेरे में.
ओ!अछूतों, देश कौन सा है
कौन सा है देश जिसकी तुम इच्छा रखते हो?
मैंने लिया वनस्पतियों से जंगली शहद,
मैंने लिया नमक पानियों से, मैंने रोशनी ली आकाश से.
मेरे पास केवल काव्य है तुम्हें देने को.
बैठ जाओ, मेरे भाइयों.
* * * * * * * * * *
पेडरो सेलिनास
स्पैनिश कवि
1891-1951
जागो दिन बुलाता है तुम्हें
जागो. दिन बुलाता है तुम्हें
तुम्हारे जीवनओर, तुम्हारा स्वधर्म.
और जीने के लिए, ज़्यादा कुछ नहीं.
जड़ से उखाड़ फेंको उदासी की रात और अंधेरा
जिसने ढँक ली तुम्हारी देह
इंतज़ार किया जिसके लिए रोशनी ने
पंजों के बल भोर में.
खड़े होओ, बल दो ईमानदार
सरल इच्छा को होने
एक शुद्ध छरहरा कौमार्य.
आजमाओ अपने शरीर की धातु को.
ठंडी, गर्म? तुम्हारा रक्त
बतलाएगा बर्फ़ के सामने
या खिड़की के पीछे.
रंग
बोलेगा तुम्हारे गालों का.
और देखो लोगों की ओर.
बाक़ी करना कुछ नहीं है
सिवाए जोड़ने के
अपने मुकम्मल को अगले दिन तक.
बीड़ा तुम्हारा अपने जीवन को ऊँचा ले जाना है,
और खेलो इस संग, इसे फेंको
बादलों तक जाती एक आवाज़ की तरह
तो शायद यह दोबारा पा ले रोशनी
जो चली गई थी पहले ही हम से.
तुम्हारा भाग्य है वह जीने के लिए.
कुछ मत करो.
तुम्हारा काम तुम हो, ज़्यादा कुछ नहीं.
* * * * * * * * * *
अंग्रेज़ी से भाषांतर- पीयूष दईया
पुर्तगाली कवि
(1893-1953)
विशाल हाथ
आँधी-तूफ़ान की रातपाली अंदर,
रहस्य कैरावल; हल्कापाल-जहाज़ उधर जाता है.
समय घूमता है, और पानियों को निराश करता है,
हवा रोती है मनहूस ज़ोर ज़ोर.
रहस्य कैरावल उधर जाता है.
इस जहाज़ उपर
कौन हाथ है इतना बड़ा
समुद्र तक से भी?
पाइलट का हाथ?
हाथ किसका?
कैरावल डूबता है,
समुद्र खड़ा है सियाह,
समय घूमता है.
इस जहाज़ उपर
बड़ा हाथ
बहते ख़ून सना है.
कैरावल उधर जाता है.
समुद्र पछाड़े खाता है,
भूमि ग़ायब होती है,
तारे गिरते हैं.
कैरावल जारी रहता है और
उपर इस जहाज़ के
सनातन हाथ
है वहाँ.
* * * * * * * *
काव्य का वितरण
मैंने लिया वनस्पतियों से जंगली शहद,
मैंने लिया नमक पानियों से, मैंने रोशनी ली आकाश से.
सुनो, मेरे भाइयों मैंने काव्य लिया सबकुछ से
इसे देवता को अर्पित करने वास्ते.
मैंने नहीं खोदा था सोना धरती से
या चूसा जोंक की तरह ख़ून अपने भाइयों का.
सरायवासियो मुझे अकेला होने दो.
फेरीवालो और साहूकारो
मैं फासलों को गढ़ सकता हूँ
तुम्हें अपने से परे रखने के लिए.
जीवन एक विफलता है,
मैं विश्वास करता हूँ ईश्वर के जादू में.
बसेरू मुर्गे बांग नहीं दे रहे,
दिन उतरा नहीं है.
मैंने देखा जहाज़ों को जाते और आते.
मैंने देखा दुर्दशा को जाते और आते.
मैंने देखा चर्बीले आदमी को आग में.
मैंने देखा सर्पीलाकारों को अंधेरे में.
कप्तान, कहाँ है कांगो?
कहाँ है संत ब्रैंडॉन का टापू?
कप्तान, कितनी काली है रात!
ऊँची नस्लवाले कुत्ते भौंकते हैं अंधेरे में.
ओ!अछूतों, देश कौन सा है
कौन सा है देश जिसकी तुम इच्छा रखते हो?
मैंने लिया वनस्पतियों से जंगली शहद,
मैंने लिया नमक पानियों से, मैंने रोशनी ली आकाश से.
मेरे पास केवल काव्य है तुम्हें देने को.
बैठ जाओ, मेरे भाइयों.
* * * * * * * * * *
पेडरो सेलिनास
स्पैनिश कवि
1891-1951
जागो दिन बुलाता है तुम्हें
जागो. दिन बुलाता है तुम्हें
तुम्हारे जीवनओर, तुम्हारा स्वधर्म.
और जीने के लिए, ज़्यादा कुछ नहीं.
जड़ से उखाड़ फेंको उदासी की रात और अंधेरा
जिसने ढँक ली तुम्हारी देह
इंतज़ार किया जिसके लिए रोशनी ने
पंजों के बल भोर में.
खड़े होओ, बल दो ईमानदार
सरल इच्छा को होने
एक शुद्ध छरहरा कौमार्य.
आजमाओ अपने शरीर की धातु को.
ठंडी, गर्म? तुम्हारा रक्त
बतलाएगा बर्फ़ के सामने
या खिड़की के पीछे.
रंग
बोलेगा तुम्हारे गालों का.
और देखो लोगों की ओर.
बाक़ी करना कुछ नहीं है
सिवाए जोड़ने के
अपने मुकम्मल को अगले दिन तक.
बीड़ा तुम्हारा अपने जीवन को ऊँचा ले जाना है,
और खेलो इस संग, इसे फेंको
बादलों तक जाती एक आवाज़ की तरह
तो शायद यह दोबारा पा ले रोशनी
जो चली गई थी पहले ही हम से.
तुम्हारा भाग्य है वह जीने के लिए.
कुछ मत करो.
तुम्हारा काम तुम हो, ज़्यादा कुछ नहीं.
* * * * * * * * * *
अंग्रेज़ी से भाषांतर- पीयूष दईया
Posted by
Arvind Gaurav
नागार्जुन की कुछ कवितायें
इन घुच्ची आँखों में
क्या नहीं है
इन घुच्ची आँखों में
इन शातिर निगाहों में
मुझे तो बहुत कुछ
प्रतिफलित लग रहा है!
नफरत की धधकती भट्टियाँ...
प्यार का अनूठा रसायन...
अपूर्व विक्षोभ...
जिज्ञासा की बाल-सुलभ ताजगी...
ठगे जाने की प्रायोगिक सिधाई...
प्रवंचितों के प्रति अथाह ममता...
क्या नहीं झलक रही
इन घुच्ची आँखों से?
हाय, हमें कोई बतलाए तो!
क्या नहीं है
इन घुच्ची आँखों में!
----------------------------------------
चन्दू मैंने सपना देखा...
चन्दू, मैंने सपना देखा, उछल रहे तुम ज्यों हरनौटा
चन्दू, मैंने सपना देखा, भभुआ से हूं पटना लौटा
चन्दू, मैंने सपना देखा, तुम्हें खोजते बद्री बाबू
चन्दू, मैंने सपना देखा, खेल-कूद में हो बेकाबू
चन्दू, मैंने सपना देखा, कल परसों ही छूट रहे हो
चन्दू, मैंने सपना देखा, खूब पतंगें लूट रहे हो
चन्दू, मैंने सपना देखा, तुम हो बाहर, मैं हूँ बाहर
चन्दू, मैंने सपना देखा, लाए हो तुम नया कलेण्डर
चन्दू, मैंने सपना देखा, लाए हो तुम नया कलेण्डर
चन्दू, मैंने सपना देखा, तुम हो बाहर, मैं हूँ बाहर
चन्दू, मैंने सपना देखा, भभुआ से पटना आए हो
चन्दू, मैंने सपना देखा, मेरे लिए शहद लाए हो
चन्दू, मैंने सपना देखा, फैल गया है सुयश तुम्हारा
चन्दू, मैंने सपना देखा, तुम्हें जानता भारत सारा
चन्दू, मैंने सपना देखा, तुम तो बहुत बड़े डाक्टर हो
चन्दू, मैंने सपना देखा, अपनी ड्यूटी में तत्पर हो
चन्दू, मैंने सपना देखा, इम्तिहान में बैठे हो तुम
चन्दू, मैंने सपना देखा, पुलिस-वैन में बैठे हो तुम
चन्दू, मैंने सपना देखा, तुम हो बाहर, मैं हूँ बाहर
चन्दू, मैंने सपना देखा, लाए हो तुम नया कलेण्डर
------------------------------------------
गुपचुप हजम करोगे
कच्ची हजम करोगे
पक्की हजम करोगे
चूल्हा हजम करोगे
चक्की हजम करोगे
बोफ़ोर्स की दलाली
गुपचुप हजम करोगे
नित राजघाट जाकर
बापू-भजन करोगे
वरदान भी मिलेगा
जयगान भी मिलेगा
चाटोगे फैक्स फेयर
दिल के कमल खिलेंगे
फोटे के हित उधारी
मुस्कान रोज दोगे
सौ गालियाँ सुनोगे
तब एक भोज दोगे
फिर संसदें जुड़ेंगी
फिर से करोगे वादे
दीखोगे नित नए तुम
उजली हँसी में सादे
बोफ़ोर्स की दलाली
गुपचुप हजम करोगे
नित राजघाट जाकर
बापू-भजन करोगे
------------------------------
क्या नहीं है
इन घुच्ची आँखों में
इन शातिर निगाहों में
मुझे तो बहुत कुछ
प्रतिफलित लग रहा है!
नफरत की धधकती भट्टियाँ...
प्यार का अनूठा रसायन...
अपूर्व विक्षोभ...
जिज्ञासा की बाल-सुलभ ताजगी...
ठगे जाने की प्रायोगिक सिधाई...
प्रवंचितों के प्रति अथाह ममता...
क्या नहीं झलक रही
इन घुच्ची आँखों से?
हाय, हमें कोई बतलाए तो!
क्या नहीं है
इन घुच्ची आँखों में!
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चन्दू मैंने सपना देखा...
चन्दू, मैंने सपना देखा, उछल रहे तुम ज्यों हरनौटा
चन्दू, मैंने सपना देखा, भभुआ से हूं पटना लौटा
चन्दू, मैंने सपना देखा, तुम्हें खोजते बद्री बाबू
चन्दू, मैंने सपना देखा, खेल-कूद में हो बेकाबू
चन्दू, मैंने सपना देखा, कल परसों ही छूट रहे हो
चन्दू, मैंने सपना देखा, खूब पतंगें लूट रहे हो
चन्दू, मैंने सपना देखा, तुम हो बाहर, मैं हूँ बाहर
चन्दू, मैंने सपना देखा, लाए हो तुम नया कलेण्डर
चन्दू, मैंने सपना देखा, लाए हो तुम नया कलेण्डर
चन्दू, मैंने सपना देखा, तुम हो बाहर, मैं हूँ बाहर
चन्दू, मैंने सपना देखा, भभुआ से पटना आए हो
चन्दू, मैंने सपना देखा, मेरे लिए शहद लाए हो
चन्दू, मैंने सपना देखा, फैल गया है सुयश तुम्हारा
चन्दू, मैंने सपना देखा, तुम्हें जानता भारत सारा
चन्दू, मैंने सपना देखा, तुम तो बहुत बड़े डाक्टर हो
चन्दू, मैंने सपना देखा, अपनी ड्यूटी में तत्पर हो
चन्दू, मैंने सपना देखा, इम्तिहान में बैठे हो तुम
चन्दू, मैंने सपना देखा, पुलिस-वैन में बैठे हो तुम
चन्दू, मैंने सपना देखा, तुम हो बाहर, मैं हूँ बाहर
चन्दू, मैंने सपना देखा, लाए हो तुम नया कलेण्डर
------------------------------------------
गुपचुप हजम करोगे
कच्ची हजम करोगे
पक्की हजम करोगे
चूल्हा हजम करोगे
चक्की हजम करोगे
बोफ़ोर्स की दलाली
गुपचुप हजम करोगे
नित राजघाट जाकर
बापू-भजन करोगे
वरदान भी मिलेगा
जयगान भी मिलेगा
चाटोगे फैक्स फेयर
दिल के कमल खिलेंगे
फोटे के हित उधारी
मुस्कान रोज दोगे
सौ गालियाँ सुनोगे
तब एक भोज दोगे
फिर संसदें जुड़ेंगी
फिर से करोगे वादे
दीखोगे नित नए तुम
उजली हँसी में सादे
बोफ़ोर्स की दलाली
गुपचुप हजम करोगे
नित राजघाट जाकर
बापू-भजन करोगे
------------------------------
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Arvind Gaurav
विद्यापति के दोहे
जय जय भैरवि असुर-भयाउनि, पशुपति भामिनी माया।
सहज सुमति वर दिअ हे गोसाऊनि, अनुगति गति तुअ पाया।।
वासर रैन सवासन शोभित, चरण चन्द्रमणि चूडा।
कतओक दैत्य मारि मुख मेलल, कतओ उगलि कय कूडा।।
साँवर वरन नयन अनुरंजित, जलद जोग फूल कोका।
कट-कट विकट ओठ पुट पांडरि, लिधुर फेन उठि फोका।।
घन-घन घनन घुँघरू कत बाजय, हन-हन कर तुअ काता।
विद्यापति कवि तुअ पद सेवक, पुत्र बिसरू जनु माता।।
रचनाकार: विद्यापति
विद्यापति के बारे में विस्तार से पढने के लिए यहाँ क्लिक करे
Posted by
Arvind Gaurav
मधुबाला
1
मैं मधुबाला मधुशाला की,
मैं मधुशाला की मधुबाला!
मैं मधु-विक्रेता को प्यारी,
मधु के धट मुझ पर बलिहारी,
प्यालों की मैं सुषमा सारी,
मेरा रुख देखा करती है
मधु-प्यासे नयनों की माला।
मैं मधुशाला की मधुबाला!
2
इस नीले अंचल की छाया
में जग-ज्वाला का झुलसाया
आकर शीतल करता काया,
मधु-मरहम का मैं लेपन कर
अच्छा करती उर का छाला।
मैं मधुशाला की मधुबाला!
3
मधुघट ले जब करती नर्तन,
मेरे नुपुर की छम-छनन
में लय होता जग का क्रंदन,
झूमा करता मानव जीवन
का क्षण-क्षण बनकर मतवाला।
मैं मधुशाला की मधुबाला!
4
मैं इस आंगन की आकर्षण,
मधु से सिंचित मेरी चितवन,
मेरी वाणी में मधु के कण,
मदमत्त बनाया मैं करती,
यश लूटा करती मधुशाला।
मैं मधुशाला की मधुबाला!
5
था एक समय, थी मधुशाला,
था मिट्टी का घट, था प्याला,
थी, किन्तु, नहीं साकीबाला,
था बैठा ठाला विक्रेता
दे बंद कपाटों पर ताला।
मैं मधुशाला की मधुबाला!
6
तब इस घर में था तम छाया,
था भय छाया, था भ्रम छाया,
था मातम छाया, गम छाया,
ऊषा का दीप लिये सर पर,
मैं आई करती उजियाला।
मैं मधुशाला की मधुबाला!
7
सोने सी मधुशाला चमकी,
माणित दॿयॿति से मदिरा दमकी,
मधुगंध दिशाओं में चमकी,
चल पड़ा लिये कर में प्याला
प्रत्येक सुरा पीनेवाला।
मैं मधुशाला की मधुबाला!
8
थे मदिरा के मृत-मूक घड़े,
थे मूर्ति सदृश मधुपात्र खड़े,
थे जड़वत प्याले भूमि पड़े,
जादू के हाथों से छूकर
मैंने इनमें जीवन डाला।
मैं मधुशाला की मधुबाला!
9
मझको छूकर मधुघट छलके,
प्याले मधु पीने को ललके ,
मालिक जागा मलकर पलकें,
अंगड़ाई लेकर उठ बैठी
चिर सुप्त विमूर्छित मधुशाला।
मैं मधुशाला की मधुबाला!
10
प्यासे आि, मैंने आिका,
वातायन से मैंने िािका,
पीनेवालों का दल बहका,
उत्कंठित स्वर से बोल उठा,
‘कर दे पागल, भर दे प्याला!’
मैं मधुशाला की मधुबाला!
11
खॿल द्वार मदिरालय के,
नारे लगते मेरी जय के,
मिटे चिन्ह चिंता भय के,
हर ओर मचा है शोर यही,
‘ला-ला मदिरा ला-ला’!,
मैं मधुशाला की मधुबाला!
12
हर एक तृप्ति का दास यहां,
पर एक बात है खास यहां,
पीने से बढ़ती प्यास यहां,
सौभाग्य मगर मेरा देखो,
देने से बढ़ती है हाला!
मैं मधुशाला की मधुबाला!
13
चाहे जितना मैं दूं हाला,
चाहे जितना तू पी प्याला,
चाहे जितना बन मतवाला,
सुन, भेद बताती हूँ अंतिम,
यह शांत नही होगी ज्वाला।
मैं मधुशाला की मधुबाला!
14
मधु कौन यहां पीने आता,
है किसका प्यालों से नाता,
जग देख मुझे है मदमाता,
जिसके चिर तंद्रिल नयनों पर
तनती मैं स्वपनों का जाला।
मैं मधुशाला की मधुबाला!
15
यह स्वप्न-विनिर्मित मधुशाला,
यह स्वप्न रचित मधु का प्याला,
स्वप्निल तृष्णा, स्वप्निल हाला,
स्वप्नों की दुनिया में भूला
फिरता मानव भोलाभाला।
मैं मधुशाला की मधुबाला!
हरिवंशराय बच्चन
मैं मधुबाला मधुशाला की,
मैं मधुशाला की मधुबाला!
मैं मधु-विक्रेता को प्यारी,
मधु के धट मुझ पर बलिहारी,
प्यालों की मैं सुषमा सारी,
मेरा रुख देखा करती है
मधु-प्यासे नयनों की माला।
मैं मधुशाला की मधुबाला!
2
इस नीले अंचल की छाया
में जग-ज्वाला का झुलसाया
आकर शीतल करता काया,
मधु-मरहम का मैं लेपन कर
अच्छा करती उर का छाला।
मैं मधुशाला की मधुबाला!
3
मधुघट ले जब करती नर्तन,
मेरे नुपुर की छम-छनन
में लय होता जग का क्रंदन,
झूमा करता मानव जीवन
का क्षण-क्षण बनकर मतवाला।
मैं मधुशाला की मधुबाला!
4
मैं इस आंगन की आकर्षण,
मधु से सिंचित मेरी चितवन,
मेरी वाणी में मधु के कण,
मदमत्त बनाया मैं करती,
यश लूटा करती मधुशाला।
मैं मधुशाला की मधुबाला!
5
था एक समय, थी मधुशाला,
था मिट्टी का घट, था प्याला,
थी, किन्तु, नहीं साकीबाला,
था बैठा ठाला विक्रेता
दे बंद कपाटों पर ताला।
मैं मधुशाला की मधुबाला!
6
तब इस घर में था तम छाया,
था भय छाया, था भ्रम छाया,
था मातम छाया, गम छाया,
ऊषा का दीप लिये सर पर,
मैं आई करती उजियाला।
मैं मधुशाला की मधुबाला!
7
सोने सी मधुशाला चमकी,
माणित दॿयॿति से मदिरा दमकी,
मधुगंध दिशाओं में चमकी,
चल पड़ा लिये कर में प्याला
प्रत्येक सुरा पीनेवाला।
मैं मधुशाला की मधुबाला!
8
थे मदिरा के मृत-मूक घड़े,
थे मूर्ति सदृश मधुपात्र खड़े,
थे जड़वत प्याले भूमि पड़े,
जादू के हाथों से छूकर
मैंने इनमें जीवन डाला।
मैं मधुशाला की मधुबाला!
9
मझको छूकर मधुघट छलके,
प्याले मधु पीने को ललके ,
मालिक जागा मलकर पलकें,
अंगड़ाई लेकर उठ बैठी
चिर सुप्त विमूर्छित मधुशाला।
मैं मधुशाला की मधुबाला!
10
प्यासे आि, मैंने आिका,
वातायन से मैंने िािका,
पीनेवालों का दल बहका,
उत्कंठित स्वर से बोल उठा,
‘कर दे पागल, भर दे प्याला!’
मैं मधुशाला की मधुबाला!
11
खॿल द्वार मदिरालय के,
नारे लगते मेरी जय के,
मिटे चिन्ह चिंता भय के,
हर ओर मचा है शोर यही,
‘ला-ला मदिरा ला-ला’!,
मैं मधुशाला की मधुबाला!
12
हर एक तृप्ति का दास यहां,
पर एक बात है खास यहां,
पीने से बढ़ती प्यास यहां,
सौभाग्य मगर मेरा देखो,
देने से बढ़ती है हाला!
मैं मधुशाला की मधुबाला!
13
चाहे जितना मैं दूं हाला,
चाहे जितना तू पी प्याला,
चाहे जितना बन मतवाला,
सुन, भेद बताती हूँ अंतिम,
यह शांत नही होगी ज्वाला।
मैं मधुशाला की मधुबाला!
14
मधु कौन यहां पीने आता,
है किसका प्यालों से नाता,
जग देख मुझे है मदमाता,
जिसके चिर तंद्रिल नयनों पर
तनती मैं स्वपनों का जाला।
मैं मधुशाला की मधुबाला!
15
यह स्वप्न-विनिर्मित मधुशाला,
यह स्वप्न रचित मधु का प्याला,
स्वप्निल तृष्णा, स्वप्निल हाला,
स्वप्नों की दुनिया में भूला
फिरता मानव भोलाभाला।
मैं मधुशाला की मधुबाला!
हरिवंशराय बच्चन
Posted by
Arvind Gaurav
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